क्या जाति की रैलियों पर रोक से जाति विनाश हो पाएगा?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दस सूत्रीय आदेश जारी किया है जिसके अनुसार अब किसी जाति के नाम पर रैली नहीं हो सकती। हालांकि उनके कई सहयोगी पार्टियों का नाम ही जाति के नाम पर है मसलन निषाद पार्टी। फिर ये लोग अपनी पार्टी की रैली कैसे करेंगे। स्वाभाविक रूप से ये पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं।

नए आदेशों के अनुसार अब गाड़ियों पर जाति सूचक शब्द प्रयोग नहीं किए जाएंगे, न साइन बोर्ड पर इनका प्रयोग होगा। न ही पुलिस थाने में अपराधियों के नाम के आगे जाति सूचक शब्द प्रयोग होंगे। इससे केवल SC-ST अपराधों को मुक्त रखा गया है। दावा किया गया है कि इससे जाति आधारित भेद भाव को दूर करने में मदद मिलेगी। वैसे लोग योगी जी को उन्हीं की बात याद दिला रहे हैं जब उन्होंने कहा था कि क्षत्रिय कुल में जन्म होने का उन्हें गर्व है। इसी कुल में भगवान राम पैदा हुए थे!

दरअसल यह सब हाई कोर्ट के 16 सितंबर के एक आदेश के अनुपालन में बताया जा रहा है जो उसने एक शराब स्मगलर के मामले में फैसला देते हुए कहा है कि जातियों को गौरवान्वित करने पर रोक लगाई जाए। यह सामाजिक सौहार्द, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ है। शासनादेश में जातिवादी नारे लगाने या स्टिकर आदि पर भी रोक लगा दी गई है। सेंट्रल मोटर व्हीकल एक्ट के अंतर्गत ऐसी गाड़ियों के चालान का आदेश दिया गया है जिन पर जाति सूचक शब्द लिखे होंगे। इसका तात्कालिक उद्देश्य तो गुर्जर समाज की महा रैली पर रोक लगाना हो सकता है जो भाजपा के खिलाफ माने जाते हैं।

लेकिन इसके अनेक दूरगामी परिणाम होंगे। यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि एक तरफ मोदी सरकार विपक्ष के दबाव में ही सही जाति जनगणना करवाने जा रही है दूसरी ओर उनकी प्रदेश सरकार इसके ठीक उल्टे काम करती प्रतीत हो रही है। इससे अनेक व्यावहारिक समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं। आखिर जाति के बिना आरक्षण, छात्रवृत्ति आदि का क्या होगा। क्या यह विराट हिन्दू एकता के प्रोजेक्ट का पार्ट है जहा शोषित उत्पीड़ित जातियों की अस्मिता को दरकिनार कर दिया जाएगा।

सार्वजनिक स्थानों पर साइन बोर्ड या घोषणा जो किसी जाति विशेष को गौरवान्वित करती है या किसी क्षेत्र विशेष को किसी जाति का घोषित करती है उस पर रोक लगा दिया गया है, उनको तत्काल हटाना होगा। FIR, रिकवरी मेमो,अरेस्ट मेमो आदि में जाति सूचक शब्द प्रयोग नहीं किए जाएंगे। सेंट्रल क्राइम नेटवर्क से जाति का कालम हटाया जाएगा। यानी अब यह जानकारी पाना मुश्किल होगा कि उत्पीड़न के शिकार लोग किस जाति के हैं और उत्पीड़क किस जाति के हैं।

इसके अंतर्गत सोशल मीडिया को भी लाया गया है। सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी की बात की गई है जिसमें किसी जाति को गौरवान्वित करने या नफरत फैलाने पर सजा का प्रावधान किया गया है। दरअसल शराब स्मगलर के मामले पर विचार करते हुए जज महोदय ने पाया कि माली,पहाड़ी ठाकुर, ब्राह्मण आदि शब्दों का FIR और सीजर मेमो में जिक्र किया गया था। इस पर उन्होंने डीजीपी को एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया कि आखिर इन जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करना क्यों जरूरी था?

डीजीपी ने जब लंबे समय से पहचान के लिए जारी इस व्यवहार को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश किया तब जज महोदय ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि जब आधार कार्ड मोबाइल कैमरा फिंगर प्रिंट आदि उपलब्ध है तो उन पहचानों की क्या जरूरत है।उन्होंने इसे प्रतिगामी करार दिया और प्रगतिशील बदलते विकसित एकताबद्ध भारत के लिए नुकसानदेह बताया।उन्होंने डॉ अम्बेडकर के जाति विहीन समाज से उद्धृत करते हुए कहा कि जातिवाद सेक्युलरिज्म के लिए गम्भीर खतरा है और इसीलिए यह हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए भी खतरा है।

उन्होंने कहा कि खास तौर पर उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति बढ़ी है। यहां तक कि घरों का नामकरण भी लोग जाति सूचक शब्दों से करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि यह मनोविज्ञान केवल समाज या धर्म में ही नहीं है बल्कि राज्य मशीनरी के मानसिक गठन में भी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्रगति विरोधी है और इसीलिए राष्ट्र विरोधी है। अम्बेडकर राजा राम मोहन राय ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फूले विवेकानंद नारायण गुरु आदि सामाजिक सुधारकों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि जाति सूचक शब्दावली का प्रयोग प्रगति और राष्ट्रीयता विरोधी है इसलिए इन पर रोक लगनी चाहिए।

हालांकि जाति आधारित रैलियों का जिक्र उच्च न्यायालय के बयान में ज़रूर है लेकिन उन पर रोक लगाने की बात नहीं है।लेकिन उसको लपकते हुए योगी सरकार ने इस पर रोक की घोषणा कर दी। हालांकि अतीत में भाजपा खुद इस तरह की बैठकें रैलियां करती रही है। लेकिन कुल मिलाकर वृहत हिंदू एकता के रास्ते में वह जातियों के संगठनों को बाधक ही मानती रही है।

बहरहाल जातियों का नाम लिया जाय या न लिया जाय, मूल प्रश्न यह है कि डॉ. अम्बेडकर जिसे भारतीय समाज में graded inequality कहते थे वह समाप्त हो रही है या नहीं? भारत में जातियों का सचमुच विनाश हो रहा है या नहीं?

दरअसल समाज के उत्पीड़ित समुदायों का जागरण हो रहा है।वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे हैं। किसी भी जाति उन्मूलन के मुहिम की असली परीक्षा यह है कि वह इन समाज के सबसे उत्पीड़ित तबकों की लड़ाई को मजबूत कर रही है अथवा नहीं। वरना जाति सूचक शब्दों को हटाने की मुहिम तो पहले समाजवादी आंदोलन के दौरान भी चल चुकी है उसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। पीडीए की रैलियों को रोकने के संकीर्ण उद्देश्य के लिए या उत्पीड़ित समुदायों की दावेदारी रोकने के लिए यह पैंतरेबाजी की जाती है तो जाहिर है यह पूरी कवायद फायदेमंद से अधिक नुकसानदेह साबित होगी।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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